


संस्कृति मंत्रालय के अधीनस्थ कार्यालय के रुप में सन् 1976 में स्थापित राष्ट्रीय सांस्कृतिक सम्पदा संरक्षण अनुसंधानशाला (एन.आर.एल.सी.), प्राचीन इमारतों, स्थलों, संग्रहालयों एवं पुरालेख सम्बन्धी संग्रह के संरक्षण सम्बन्धी शोध कार्य हेतु समर्पित अपने ढंग की एक प्रमुख संस्था है।
एन.आर.एल.सी. अपने लक्ष्यों की प्राप्ति वैज्ञानिक शोध, शिक्षण एवं प्रशिक्षण, क्षेत्र-परियोजनाओं, पारस्परिक सहयोग तथा शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों, सम्मेलनों, कार्यशालाओं, प्रकाशनों एवं जन-प्रतिभागिता के माध्यम से करती है।
एन.आर.एल.सी. पर्याप्त आधारभूत संरचना तथा सामग्रियों के विश्लेषण, परीक्षण एवं संपोषणीय संरक्षण सम्बन्धी हल विकसित करने के लिये प्रयोगशालाओं से भली-भाँति सुसज्जित है।
एन.आर.एल.सी. सामग्रियों की संरचना एवं कला-विन्यास की तकनीक, क्षय की प्रक्रिया को धीमी करने की विधियों तथा भविष्य में होने वाले क्षय को रोकने, क्षय के कारणों सम्बन्धी सूचना प्रदान करने एवं उपचार के विकल्पों, संरक्षण सम्बन्धी निदान (हल) ढूँढने तथा सांस्कृतिक सम्पदा सम्बन्धी सामग्री के उपचार कार्यों का मूल्यांकन करने से सम्बन्धित शोध कार्य संचालित करती है। एन.आर.एल.सी. ने लगभग २०५ शोध पत्रों का प्रकाशन उत्कृष्ट राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय जर्नल्स में किया हैं I प्रयोगशाला ने वर्ष 2019 में दो एकस्व अधिकार पत्र (पेटेंट) प्राप्त किया है।
समय बीतने के साथ-साथ एन.आर.एल.सी. के तीन परिसर - दो लखनऊ में और एक मैसूर, में विकसित हुए है। एन.आर.एल.सी. ने सैकड़ों प्रशिक्षित संरक्षण विदों (राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय) को उत्पन्न किया है। सन् 2011 में क्षेत्र परियोजनाओं के लिये सरकार द्वारा जमा-शीर्ष स्वीकृत किये जाने के पश्चात् एन.आर.एल.सी. के पास अब अन्य निजी, सार्वजनिक तथा सांस्कृतिक संस्थाओं के संरक्षण सम्बन्धी कार्यों का दायित्व, शुल्क के आधार पर, लेने का शासनादेश है। एन.आर.एल.सी. ने कुछ महत्वपूर्ण संरक्षण परियोजनायें भी पूरी की हैं और कुछ अभी चल रही है।
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